श्री कृष्ण जन्माष्टमी – Sri Krishna Janmashtami

जिस स्थान पर ईश्वर या देवता  अपनी दिव्य  शक्ति के रूप में विराजमान होते हैं वह तीर्थ कहलाता है  व उस स्थान को तीर्थ स्थान कहते हैं | इसी प्रकार जिस दिन परमेश्वर स्वयं अवतरित होते हैं वह दिन पूज्य, पवित्रता देने वाला व पर्वमय हो जाता है | श्री कृष्ण जन्माष्टमी के दिन हम सभी व्रत रखकर श्रद्धा व्यक्त करते हैं व पूज्य भावों से उपासना करते हैं | इस दिन केवल फल आहार किया जाता है | व्रत का अर्थ है की विश्राम की मुद्रा में न रहें | इस दिन लेटना नहीं है | बैठते हुए कुर्सी से पीठ लगाकर नहीं बैठना है | इस प्रकार शरीर की साधना की जाती है | शरीर को साधने से मन में दृढ़ता आती है व ईश्वर के प्रति आस्था के भाव दृढ होते हैं | मंदिरों में जाकर भजन कीर्तन में सम्मिलित होने से मन बुद्धि में पवित्रता आती है |

                ॐ वन्दे प्रभु पादार्विन्देभ्यो: दुर्लभं |  
                    योगी कुल वंदितं, कर्मसु कौशलम ||

ईश्वर का ध्यान सदा ही कल्याणकारी है | श्री कृष्ण कर्म मार्ग पर आचरण करने के लिए कहते हैं | अपने अपने धर्म में रहते हुए कर्म करते हुए मोक्ष प्राप्त करने के लिए कहते हैं | ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य (व्यापारी) व  शूद्र  (कृषक) इन चारों वर्णों में अपने अपने स्वाभाविक कर्मों को करना चाहिए | कर्म करने में सभी की स्वतः ही रूचि होती है | ईश्वर ने हमें कर्म करने का अत्याज्य   स्वभाव दिया है |

भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं कि जैसा श्रेष्ठ पुरुष आचरण करता है, वैसा ही अन्य भी करते हैं इसलिए मैं भी कर्मों में ही आचरण करता हूँ | यह साधारण सी उक्ति नहीं है | इसका गहन अर्थ है | इससे ऐसा प्रतीत होता है कि यदि श्रेष्ठ व्यक्ति गलत कार्य करेगा तो क्या समझदार व्यक्ति भी गलत कार्य करने लगेगा | आप सोचेंगे कि नहीं | मैं तो कभी गलत कार्य नहीं करूंगा | किन्तु यह नियम कहता है कि सभी श्रेष्ठ पुरुष का अनुकरण करते हैं | चाहे वह अच्छा कार्य हो या बुरा | अब आप भारत मैं पाश्चात्य वस्त्रों के अनुकरण को ही ले लीजिये | पहिले सभी स्त्री पुरुष आधे अधूरे वस्त्रों को पहननें में संकोच करते थे | ऐसे वस्त्रों को पहिनने की शुरुवात संभ्रांत वर्ग ने की | जिनका समाज में मान  सम्मान व प्रभुत्व था | अर्थात जो श्रेष्ठ्वत थे | फिर समाज के अन्य लोगों ने उनका अनुकरण आरंभ किया | और आज सभी ने संकोच का त्याग कर पाश्चात्य वस्त्रों को अपना लिया है | इसके विपरीत यदि आज भी उच्च वर्ग के व्यक्ति धोती कुरता का परिधान आरंभ कर दें तो इस नियम की ऐसी प्रबलता है कि बाकी लोग भी प्रभावित होकर धोती कुरता पहिनना आरंभ कर देंगे |

ईश्वर जब भी अवतरित होते हैं, कर्मशील इस संसार में जीवन पर्यंत कर्मों में आचरण की ही लीला करते हैं | भगवान शेष कर्माधार  है व भगवान विष्णु स्वयं कर्म स्वरुप हैं | आइये इस दिन हम व्रत व उपासना करें तथा योगेश्वर श्री कृष्ण के श्रेष्ठ जीवन का अनुकरण करें |

योगेश्वर श्री कृष्ण कहते हैं कि मैं आत्माओं में उत्तम (परमात्मा) हूँ | इसलिए पुरुषोतम हूँ | मैं अविद्या (अज्ञान का वह अंधकार जो है ही नहीं) से अत्यंत परे सच्चिदानंदघन परब्रह्म परमात्मा हूँ | अर्थात जो स्वयं ज्ञानस्वरूप हैं और जिनके समक्ष अज्ञान उत्पन्न नहीं हो सकता है |
                        मन ने सोचा, आज व्रत है |
                        आज क्यों हरि में मन रत है |
                        कुछ भी करूँ शुद्ध भाव बना रहता है |
                        क्यों मन में दुर्विचारों का आना मना रहता है |
                        क्यों श्रद्धा मन को मना लेती है |
                        मैं व्रती हूँ, क्षुधा प्रतिपल ऐसा भाव बना देती है |

Source Article by Diwakar Sharma on Knol
http://knol.google.com/k/diwakar-sharma/–/3f0ibblitj66a/55  
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कृष्ण जन्मकथा

श्रीकृष्ण का जन्म भाद्रपद कृष्ण अष्टमी की मध्यरात्रि को रोहिणी नक्षत्र में देवकी व श्रीवसुदेव के पुत्र रूप में हुआ था. कंस ने अपनी मृत्यु के भय से अपनी बहन देवकी और वसुदेव को कारागार में कैद किया हुआ था. भगवान के निर्देशानुसार कुष्ण जी को रात में ही मथुरा के कारागार से गोकुल में नंद बाबा के घर ले जाया गया.

नन्द की पत्नी यशोदा को एक कन्या हुई थी. वासुदेव श्रीकृष्ण को यशोदा के पास सुलाकर उस कन्या को अपने साथ ले गए. कंस ने उस कन्या को वासुदेव और देवकी की संतान समझ पटककर मार डालना चाहा लेकिन वह इस कार्य में असफल ही रहा. इसके बाद श्रीकृष्ण का लालन–पालन यशोदा व नन्द ने किया. जब श्रीकृष्ण जी बड़े हुए तो उन्होंने कंस का वध कर अपने माता-पिता को उसकी कैद से मुक्त कराया.

जन्माष्टमी में हांडी फोड़
श्रीकृष्ण जी का जन्म एक उत्सव के रूप में मनाया जाता है. इस उत्सव में भगवान के श्रीविग्रह पर कपूर, हल्दी, दही, घी, तेल, केसर तथा जल आदि चढ़ाने के बाद लोग बडे हर्षोल्लास के साथ इन वस्तुओं का परस्पर विलेपन और सेवन करते हैं. कई स्थानों पर हांडी में दूध-दही भरकर, उसे काफी ऊंचाई पर टांगा जाता है. युवकों की टोलियां उसे फोडकर इनाम लूटने की होड़ में बहुत बढ-चढकर इस उत्सव में भाग लेती हैं.

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